Monday, 15 February 2016

धूप !

 
                         धूप !!


धूप अब बहुत देर तक नहीं रूकती है
आँगन की मुंडेर पर ठिठक कर मुड़ जाती है
जैसे कुछ तलाशती हुई आई हो ...दूर से! मगर ...
आँगन!! सूने आँगन में आखिर कब तक ............
कब तक पथरीली दीवारों से चिपक कर
धूप खड़ी रहे सूने आँगन को निहारती हुई
कब तक ..............................................................

अब आँगन में किलकारियाँ नहीं गूंजती
न ही हँसी ,ठिठोली और बातों के वो लंबे दौर !
न ही गीतों की वो लुभावनी आवाज़! ढोलक की थाप !
न वो अल्हड़ गोरियों का ठुमक कर नाचना ................
कि धूप चाह कर भी वो आँगन छोड़ नहीं पाती थी
घिसटते-- घिसटते मुंडेर तक जाकर दीवार से चिपकी रहती थी  ।
मगर कब तक.........................................................................

धूप का मन ही नहीं होता था ,वो !आँगन की रौनक छोड़ने का !
मगर ...अब !! अब धूप रूकती नहीं है .................................
चली जाती है सिर्फ मुंडेर से झांककर ही ......
क्योंकि अब सूने आँगन में धूप का मन उदास होता है !
लंबे पसरे सन्नाटों को अब कोई नहीं तोड़ता ।
न सर्दी में ! न गर्मी में ! न बसंत में ! न ही पतझड़ में !!!
गहरे सन्नाटे .....................................................................
ये गहरे सन्नाटे किसी कुएँ जैसे प्रतीत होते हैं
जिसमें कोई रौशनी नहीं होती ! मगर ..........
जीवन होता है चहल पहल नहीं होती !
और हर छोटी सी आवाज़ को वो सन्नाटा बढ़ा देता है
और आवाज़ उन्हीं दीवारों से टकराती हुई गूंजती रहती है!
फिर थोड़ी देर बाद वही सन्नाटा !अँधेरा और सूनापन !
धूप कुएँ तक नहीं जाती है ...........................................
आँगन की मुंडेर को छूकर चली जाती है .........................
धूप अब बहुत देर तक नहीं रूकती है ...............................

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अंशु प्रधान(मन की बात)

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